देश आज कहाँ खड़ा है, पुलवामा हमले से जुड़ी कविता

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The अख़बार:  देश आज कहाँ खड़ा है, पुलवामा हमले से जुड़ी कविता

 

खून तो उबलता बहुत है
देश के भक्त किरदारों का
पर नियम भीअजब है
देश के पैरेकारों का


बाहरीे दुश्मन दिख जाते है
अंदर के गद्दारों की बात कहें क्या
जब कोई शहादत पर जवान के
देश केअंदर ही जश्न मनाए
और मूक देखता प्रशासन
हाथ मलते ही रह जाए


देश हमारा जूझ रहा है
चौतरफे उत्पातों से
लगता अचानक बाढ़ आ गई
तरह तरह के उन्मादों की
कोई सत्ता कुर्सी की खातिर
कोई वैभव विलास की खातिर
कोई कुत्सित चाहत की आड़ में
अपनी अपनी रोटी सेंक रहा है


कितनी आहत, कितनी त्रासद
उन परिजनों की पीड़ा होती होगी
ऊंचा-पूरा, निर्भीक जवान जब
गर्वित देश की रक्षा की खातिर
दुश्मन के मंसूबे नाकाम करने
खुद के जान की परवाह न कर
बहादुरी से वीर गति की पाता है
और इधर उनके बलिदानो पर
हर कोई मुह उठा अनापशनाप,
बे मतलब प्रलाप किये जाता है


देश आज कहाँ खड़ा है
बारूद के ढेर पर या
मतलब फ़रोशों के निशाने पर
पीड़ा होती द्विगुणित जब देखें
देश के अंदर उतने ही देश द्रोही
जितनी बाहर उनकी जमात लगी
खण्ड खण्ड कर डाला विश्वास को
तार तार कर डाला जज्बातों को
किन्तु इस पीड़ा का अंत भी आएगा
अत्याचारों का बदला भी लिया जाएगा
जिनकी सांसें थम गईं कर्तव्य मार्ग पर
वो यूँ ही जाया नही हो जाएगा
हर पीड़ा का कई गुना बदल
दुश्मनों से लिया जाएगा
विश्वास हम नागरिक का
सरकार को बनाए रखना होगा
- नीता झा

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