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Bastar dussehra- आखिर क्यों है विश्व प्रसिद्ध "बस्तर दशहरा"


Bastar dussehra बस्तर दशेहरा - बस्तर का दशहरा दुनिया के लोक परम्पराओं में सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है | इसकी खासियत ये है कि ये दुनिया का सबसे लंबे समय तक चलने वाला लोक-त्यौहार है। अपनी विशिष्ट कला संस्कृति और अनोखी लोक संस्कृति भी कारण है जो बस्तर वैश्विक स्तर हमेशा से ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यहाँ पाई जाने वाली चींटी, जिसे स्थानीय बोली में चपड़ा चीटीं कहा जाता है, उसकी चटनी, दिग्भ्रमित कर देने वाले घने जंगल, स्थानीय मादक पेय सल्फीऔर लंदा, यहां की लाल मिट्टी और नक्सलवाद के साथ ही बस्तर का दशहरा (Bastar dussehra) दुनिया के लिए आकर्षण रहा है।

Bastar dussehra

राजा पुरुषोत्तम देव नें किया था शुरुआत


एक मान्यता के अनुसार चालुक्य शासक भैराज देव के पुत्र, राजा पुरुषोत्तम देव नें एक बार उड़ीसा के जगन्नाथ पूरी कि पद-यात्रा करके एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ, सोने के आभूषणों सहित बहुत से सामान जगन्नाथ भगवान् को अर्पित किया, वहाँ के पुजारी को सपनें में जगन्नाथ भगवान् नें राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति घोषित करनें का आदेश दिया था| संवत 1465, दिन सोमवार, फागुन कृष्ण के चौथे दिन में अपनी 25 वर्ष कि आयु में राजा पुरुषोत्तम देव नें राजा के रूप में पदग्रहण किया | राजा पुरुषोत्तम देव के वापिस आने के बाद से ही बस्तर में गोंचा और दशहरा पर्व (Bastar dussehra) कि शुरुआत हुई|

Bastar dussehra

पाट जात्रा विधान

पाट जात्रा विधान में ग्रामीणों द्वारा रथ के लिए पहली लकड़ी काटनें और उससे रथ निर्माण करनें से सम्बंधित होता है| बारिश के मौसम में श्रावण महीनें कि हरेली अमावस्या (स्थानीय बोली में आमुस) के त्यौहार के दिन में रथ के लिए पहली लकड़ी का चयन कर जंगल से उसे काटा जाता है | इसे विधिवत मन्त्रों और नियमों का पालन करते हुए किया जाता है | इस लकड़ी से रथ पट का निर्माण किया जाता है| इस लिए इसे पाट जात्रा विधान कहतें हैं|  

हर वर्ष 75 दिनों मनाया जाता है त्यौहार
पर्व की शुरुआत बस्तर (Bastar dussehra) की आराध्य “काछन देवी” को कांटे के झूले में झुलाने की रश्म के साथ हुई। काछन देवी यहाँ कि स्थानीय देवी हैं, जिनकी यहाँ के आदिवासियों में बहुत मान्यता है| इनकी अनुमति मिलने के बाद ही यह पर्व मनाया जाता  है। 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा (Bastar dussehra) को दुनिया का सबसे लंबी अवधी तक चलने वाला त्यौहार माना जाता है। देशी विदशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी इसलिए ही रहा है | इस वर्ष भी सैलानियों कि लाखों की भीड़ यहाँ जुट गई है। यह परंपरा (Bastar dussehra) यहां पिछले 608 वर्षों से चली आ रही है।

जोगी कि आसन साधना

अश्विन शुक्ल पक्ष के पहले दिन समाधि लेकर एक ही जगह में बैठे "जोगी"  को उठा कर भेंट देकर सम्मानित किया जाता है| इसी रात को मवाली परघाव भी किया जाता है | इस रस्म के अनुसार दंतेवाडा से लाइ गयी मावली माता कि मूर्ति, जो कि एक डोली में लाइ गयी होती है, उसका स्वागत किया जाता है| आदिवासी मायता के अनुरूप माता कि डोली को जगदलपुर में दंतेश्वरी मंदिर में रखा जाता है | 

 

काछन गादी में देवी का प्रतिरूप
काछनगादी का विधान 9 अक्टूबर की शाम भंगाराम चौक के पास संपन्न् हुआ। काछनदेवी बस्तर में मिरगान आदिवासियों कि कुल देवी मानी जाती हैं| हर वर्ष कि तरह, देवी के रूप में नौ साल की हरिजन बालिका को “कांटे के झूले” में झुलाया | देवी स्वरूपा मारेगा की अबोध बालिका अनुराधा दास को कांटे के झूले की परिक्रमा कराई गई उसके बाद उसे कांटे के झूले में झुलाया गया। बताया गया कि यह बालिका गत सात दिनों से फलाहार थी और इस नवरात्रि के दौरान पूरे नौ दिनों तक उपवास रखेगी। उसने पहले राजा से युद्ध किया, उसके बाद स्वीकृति सूचक फूल देकर राजा को दशहरा मनाने की अनुमति प्रदान की। इसके बाद रथ परिक्रमा कि गयी| इस मौके पर हजारों दर्शक अभूतपूर्व दशहरा रस्म को देखने मंदिर के चारों तरफ जुटे रहे। बस्तर दशहरा के प्रमुख विधानों में से एक काछन गादी का विधान है|

छह सदियों से चली आ रही है परंपरा
छह सदी पुरानी इस परंपरा के तहत ही मंगलवार शाम राज परिवार के सदस्य आतिशबाजी के साथ राजमहल से निकले और शाम सात बजे काछनगादी मंदिर पहुंचे। यहां उनका परंपरागत स्वागत किया गया। इस मौके पर राज परिवार के कमलचंद भंजदेव अपने पूरे परिवार के साथ मौजूद थे। इस उत्सव में एक विशेष प्रकार कि भव्यता देखनें को मिलीं |

निभाई रैला पूजा की रश्म
काछनगादी पूजा के पश्चात बस्तर दशहरा के पदाधिकारी, मांझी, चालकी और मेंबर-मेम्बरीन आदि गोल बाजार पहुंचे और वहां रैला पूजा में शामिल हुए। बताया गया कि बस्तर की एक राजकुमारी ने आत्मग्लानि के चलते जल समाधि कर ली थी। उसी की याद में मिरगान जाति की महिलाएं यहां शोक गीत गाती हैं और राजकुमारी की याद में श्राद्ध मनाती हैं। इस मौके पर पूजा स्थल पर लाई-चना आदि न्योछावर किया गया।

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