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चुनौतियों के बीच सबसे कठिन माहौल में काम करते जवान


जगदलपुर: यूं तो पूरा बस्तर संभाग किसी ना किसी चुनौतियों के बीच अपने काम को अंजाम दे रहा है, किसानों मजदूरों की अपनी चुनौतियां हैं, नौकरीपेशा और व्यवसायियों की अपनी, परंतु प्रशासनिक अम्लों (सुरक्षाकर्मी) को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

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सर्वविदित है कि बस्तर संभाग में सबसे अधिक जोखिम भरा काम सुरक्षाबलों को करना पड़ता है जिसमें केंद्रीय पुलिस बल हो या अन्य सुरक्षा बल शामिल हो, ये लोग हमेशा अपनी जान को जोखिम में डालकर लोगों की सुरक्षा करते हैं, नक्सल प्रभावित इलाकों में अपनी जान को ताक में रख कर ये सुरक्षाकर्मी नक्सली संगठन से मुठभेड़ करते रहे हैं, जिसका खुलासा हमेशा से अखबारों से या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से और न्यूज़ पोर्टल्स के माध्यम से देखने को मिलता ही है। कई घटनाएं तो इतनी ज्यादा हृदय विदारक होती है जिसे सुनकर या पढ़कर आम लोगों के मन में हिंसा और नफ़रत से भरी भारतीय राजनीति के लगातार गिरते सम्मान में वृद्धि होती हैं, अपने वीर जवानों को खोने की वजह से परिवार जनों की आंखों में आंसू आना स्वाभाविक ही है। मुझे वह मंजर याद है, जब इन दिशाहीन माओवादियों ने अपनी कायराना करतूत दिखाई थी, घटना संभवतः 2014 की है, सुकमा जिले में हमारे जवानों के साथ बहुत ही भयानक तरीके से माओवादियों ने हमला किया था, जिसमें बहुत से जवान शहीद हुए थे।


CRPF

अख़बारों में उनकी क्षत- विक्षत लाशों के बारे में सोचकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन जवानों के बलिदानों को हम बस्तर वासी सैल्यूट करते है।

उक्त बातें लोगों के जेहन में डालना इसलिए जरूरी था क्योंकि आजकल लोग स्वार्थ वश अपनी भलाई के अलावा कुछ नहीं सोचते जिनमें आज भी बहुत से लोग इन जवानों को तहे दिल से आदर करते हैं एवं उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। अब दूसरी ओर बस्तर संभाग में लगभग सभी जिलों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, लेकिन बहुत ही कठिनाइयों के बाद यह निर्माण प्रशासन द्वारा किया जा रहा है, जिसमें मुख्य भूमिका हमारे जवानों की रहती है जिनके बदौलत ही ऐसी सड़क बनना संभावित है।

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 बस्तर के एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र में यात्रा के दौरान द अखबार के प्रधान संपादक विमलेंदु झा

इन सब क्षेत्रों में लगातार हमारी टीम दौरा करती है, ग्रामीणों और कर्मचारी अधिकारियों से क्षेत्रीय स्टार की समस्याओं पर चर्चा भी होती है, हमने पाया कि बस्तर ज़िले का अधिकांश हिस्सा माओवाद प्रभावित है, जिस पर एक छत्र राज्य या हुकूमत आज भी उनकी चलती है। परंतु अब माओवादी बैकफुट पर जाने को मजबूर हो रहे हैं क्योंकि वर्तमान स्थिति में सुरक्षा बल एवं आला अधिकारियों द्वारा अच्छी रणनीति के चलते माओवादियों की संख्या भी निरंतर घटती जा रही है जिसमें कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिसका परिणाम सामने दिख रहा है। बीच-बीच में हमारे जवानों द्वारा आत्महत्या करना काफी हृदय विदारक होता है, जिस हेतु शब्दों का चयन करना बहुत ही मुश्किल होता है क्योंकि वह जवान बहुत सी परेशानियों के बीच लोगों की सुरक्षा में अपने आप को व्यस्त रखते हैं। जिनकी कुछ अपनी भी व्यथा होती है, जिसे वे किसी से सही ढंग से बता भी नहीं पाते जिसका दुष्परिणाम ऐसे आत्महत्या जैसे कदम के रूप में देखने को मिलता है जोकि बहुत ही दर्द विदारक है।

कुल मिलाकर अब उक्त बातों को ध्यान देते हुए शासन प्रशासन को इन विषयों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर इन जवानों की समस्याओं के प्रति और अधिक सजग होने की आवश्यकता है, क्योंकि इनका परिवार भी इनके साथ जीवन बिताना चाहता है एवं त्यौहार आदि मनाना चाहता है।

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