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देश का युवा अब खुले मंच पर करता है सरकार से सवाल


The अख़बार: विशेष। देश का युवा अब खुले मंच पर करता है सरकार से सवाल

भारत देश के संविधान की ख़ास बात यही है की देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, इसी आज़ादी के अधिकार से हम सभी अपनी आवाज़ रखने में समर्थ है, आज हम एक युवा की लिखी कुछ कविताएँ एवं लेख आपसे साझा कर रहे है जो खुले मंच पर सरकार से सवाल करना चाहता है. नाम है चैतन्य गोपाल।


आइये पढ़ते है क्या लिखते है चैतन्य -

 The अख़बार: विशेष। देश का युवा अब खुले मंच पर करता है सरकार से सवाल

"जो ख़िलाफ़ है इंसानियत के
वो जुनून क्यूं चाहता है

गर उस भीड़ की शक्ल ही नहीं
तो वो खून क्यूं चाहता है

मज़हबी भीड़ ने कुचला है इंसान को
किसी मां को रुलाकर
वो सुकून क्यूं चाहता है"

 

"मज़हबी भीड़" का मतलब किसी भी विशेष समुदाय से नहीं है।
और जो लोग ये कहने वाले है की फलाना के साथ ऐसा हुआ तो आप कहा थे, तो मैं बताना चाहूंगा कि जब से कलम पकड़ा हूं, तब से जो देख रहा हूं वही लिख रहा हूं, अब मुझे एक ज़रिया (YQ) मिला है तो लिख रहा हूं🙏

अब बात इंसाफ की: "जून 2019" पूरी दुनिया ने देखा कि एक आक्रोशित भीड़ ने "तबरेज अंसारी" को 13 घंटे तक खंभे से बांधे रखा, बुरी तरीके से पीटाई भी की, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई।
पर झारखंड पुलिस ने तबरेज अंसारी हत्याकाण्ड के 11 आरोपियों पर से हत्या का आरोप हटा कर इस केस को
गैर - इरादतन हत्या घोषित किया है, उन्होंने इस विषय में कहा कि, तबरेज की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है, जबकि पूरी दुनिया ने देखा कि "सच" क्या है, पर पुलिस ने धारा "302 से हटाकर 304" कर केस को कमज़ोर किया है।

(20 सितंबर 2019 को फिर से 304 से 302 : क्विंट रिपोर्ट )

एक और बात मै कहना चाहता हूं, कि चलो मान लिया कि उसने चोरी की थी, और लोग उसको चोरी करने की वजह से पीट रहे थे, पर उसका नाम "तबरेज" होने की वजह से उससे "जय श्री राम" के नारे लगवाना, ये किस तरह का गुस्सा है, क्या ये सांप्रदायिक मामला नहीं?
मै खुद एक हिन्दू हूं, और मैं जिस मर्यादा पुर्सोत्तम "राम" को जानता हूं, उन्होंने कभी नहीं सिखाया कि राम के नाम पर किसी की हत्या हो 😐

 

"चमकते उस जुते को देख मन मचल जाता है
आम आदमी हूं साहब
कीमत देखते ही, ख्याल बदल जाता है

तसल्ली के खिलौने से,मन बहल जाता है
आम आदमी हूं साहब
कम पैसों में भी मेरा काम, चल जाता है

मेरा ख्वाब भी आसमां से,ज़मीं में बदल जाता है
आम आदमी हूं साहब
औकात के सांचे में,हर ख्वाब मेरा ढल जाता है"
✍Cj چیطانیا

 

"आज भी हम कैद है मजहबी पिंजरे में
इंसान, इंसान नहीं हर किसी के नज़रिए में

क्यू बटी है दुनिया जात पात में
क्यू होती है सियासत हर बात पे

मजहब का लिबाज़ ओढ़े अपने धंधे चलाते हैं
ये वो है जो हवा को भी मजहबी बताते है

दौलत की तलब में वो कहां संभलते हैं
चेहरा तो चेहरा अपना वजूद तक बदलते हैं

कोई सत्ता के नशे में चूर है
कोई पेट की खातिर मजबूर है

सड़क पर चलती औरत सर - ए - आम होती है
यहां तो फकीरों की चीजे भी नीलाम होती है

अभी भी वक़्त है तुम अमन के निशान बन जाओ
इंसानियत को मजहब समझो, चलो तुम इंसान बन जाओ"

 

"बीते कुछ सालों में,कई किरदार बन गए
कभी चायवाला,कभी फ़कीर,आज चौकीदार बन गए

ये आवाम भी कभी एक हुआ करती थी
साहब, मजहबों के बीच दीवार बन गए

जिसने रोटी की आस में इन्हे सत्ता दिलाई
वहीं युवा आज बेरोजगार बन गए

तुम पढ़ लिख कर पकोड़े बेचो
ऐसे सोच वाले हमारे सरकार बन गए

कोई तड़ीपार, कुछ आरोपी शामिल हैं इनकी गिरोह में
झूठे राष्ट्रवाद की आड़ में,सब ईमानदार बन गए "

 

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