"प्रधानमंत्री के नाम मेरा पत्र" - रिटायर्ड शिक्षक का मोदी जी को खुला पत्र

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बस्तर के एक रिटायर्ड शिक्षक का देश के प्रधान मंत्री को खुला पत्र इन दिनों सुर्खियों में है, जिनका नाम सुबोध कुमार ठाकुर उम्र 80 वर्ष के लगभग, ज़रूर पढ़े!

प्रधानमंत्री के नाम मेरा पत्र

सुबोध कुमार ठाकुर

 

 

माननिय मोदी जी !

सादर अभिवादन !

पहले तो ‘मोदी जी’ संबोधन की धृष्टता के लिए क्षमा करें. दूसरी बात, इस पत्र से जो मैसेज मैं देना चाहता हूँ, उसे अमेरिकी राष्ट्रपति महोदय से शेयर करूँ- ‘यह ख्याल आया’- फिर सोचा स्वदेश के प्रधान मंत्री महोदय को सरपास करके डायरेक्ट अमेरिकी राष्ट्रपति महोदय से उद्गारों का शेयर करना ठीक नहीं है, इसलिए आपको संपर्क कर रहा हूँ.

मेसेज का ज्वलंत सन्दर्भ है- U.N.O.  की बैठक में चीन द्वारा ‘मसूद अजहर’ को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित किये जाने सम्बन्धी प्रस्ताव के विरोध में बार-बार ‘विशेषाधिकार’ (वीटो पॉवर) का उपयोग किया जाना|

मैं मानता हूँ कि U.N.O. के संविधान में स्थाई सदस्यों (मूलतः चार सदस्य और अब पांच) को ‘वीटो पॉवर’ किया गया है, परन्तु ऐसे प्रावधान का यह तो तात्पर्य नहीं है कि कोई भी स्थाई सदस्य अपनें वीटो पॉवर का ‘दुरुपयोग’ भी कर सकता है- शायद नहीं, ठीक वैसे ही, जैसे- पिता अपनें पुत्र को स्नेह वश ‘बिस्कुट-चॉकलेट’ के लिए पैसे दे और उसका पुत्र उस पैसे को ‘बीड़ी पिनें’ में खर्च कर दे.

ठीक इसी तरह से चीन अपनें वीटो पॉवर का बार-बार दुरुपयोग कर रहा है. मसूद अज़हर के आतंक के सन्दर्भ में बाकी के स्थाई सदस्य बार-बार प्रस्ताव पेश करते जा रहें हैं और विश्व के अन्यान्य देश भी इस प्रस्ताव का समर्थन करते रहें हैं, तो क्या चीन को एक ज़िम्मेदार सदस्य कि भाँती उस प्रस्ताव पर संजीदगी से चिंतन-मनन नहीं करना चाहिए- वह ऐसा न करते हुए बार-बार (और अब तक चार बार) उस प्रस्ताव के विरोध में अपनें वीटो पॉवर का उपयोग करता रहा है, मानो “वीटो-पॉवर न हुआ, ‘चना-चबेना’ हो गया.” क्या चीन के द्वारा एक ही प्रस्ताव पर बार-बार ‘वीटो’ करना, ‘वीटो पॉवर’ का दुरुपयोग नहीं है? यदि है, तो ‘वीटो पॉवर’ सशर्त होनी चाहिए- कम से कम इतनी बंदिश तो अवश्य ही होनी चाहिए कि कोई भी स्थाई सदस्य एक ही विषय/प्रस्ताव पर एक से अधिक बार ‘वीटो’ नहीं कर सकता.

मेरे उक्त विचार से यदि आप सहमत हों, तो U.N.O. के अन्य सदस्यों से इस सन्दर्भ में तालमेल बनाने की कोशिश करेंगे और यदि असहमत हों, तो इसे होलिका की गोद में बिठाकर होली जला दें. “न रहे बांस, न बजे बांसूरी!’

पत्र – सुबोध कुमार ठाकुर (सेवानिवृत्त शिक्षक)

जगदलपुर, जिला- बस्तर  (छ.ग.)

 

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