ख़ास कलम / "मैं भारत की स्त्री खुद ही खुद को गढ़ रही हूं"

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मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं
कभी सँवरती कभी बिखरती हूँ
मैं भारत की स्त्री खुद ही खुद को गढ़ रही हूं


मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं
घर को कभी सलीके से सँवरती
कभी नया, अलबेला भी गढ़ रही हूं
भूली नही त्रासदी सदियों पुरानी भी
इसलिए अपने बच्चों को अच्छाइयों की बातें
कहानियों से सुना रही हूं

गर्भ में पलता या गोद मे या देश भक्ति के काम लगे
मेरी हरेक सन्तान हमेशा मुझसे ही तो बल पाती है
मैं जो भी उन्हें सिखाऊँ थोड़ा ही सही पर
कुछ अच्छा ही सीखती है 

इसी आशा के चलते
अच्छाई के उत्तुंग शिखर पर
अपनी आमद का  परचम लहरा रही हूं
मैं आजाद देश की आजाद स्त्री
आजादी के सही मायने
दुनिया को बता रही हूं

मैं भारत की स्त्री अंदर ही अंदर
बढ़ रही हूं
कभी निखरती कभी बिखरती
खुद से खुद को गढ़ रही हूं

 

- नीता झा (रायपुर)

 

 ख़ास कलम / "मैं भारत की स्त्री खुद ही खुद को गढ़ रही हूं"

 

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