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प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाया मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की जन्मशती


The अख़बार: प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाया मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की जन्मशती

सन 1919में आज़मगढ़ ज़िला के मज़वां मौजा में जन्मे मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी साहब की जन्मशती पर एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन जगदलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा पत्रकार भवन में किया गया. इस कार्यक्रम में शहर के बुद्धिजीवी, रंगकर्मी, चित्रकार, मीडियाकर्मी और पत्रकार, तथा आम नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी एम. ए. रहीम ने की.

The अख़बार: प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाया मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की जन्मशती


कैफ़ी साहब ने लिखा है -
" वो खेत कौन उजाड़ेगा कौन लूटेगा
उगी हुई हैं मुंडेरों पे जिनकी शमशीरें (तलवारें )
अवाम का इज़्तराब (उद्विग्नता )
ये अवाम का पेचो- ताब है ये
सितम से दबना है ग़ैर मुमकिन,
कि हर सितम का जवाब है ये...


कैफ़ी साहब ज़िन्दगी भर व्यावहारिक रूप में और शायरी में प्रगतिशील और आम अवाम, मज़दूरों, किसानों के पक्ष में खड़े रहे. इस कार्यक्रम में वैचारिक सत्र में दो जनगीत विमलेन्दु शेखर झा और वेदांत झा ने गाकर माहौल में संघर्ष का उत्साह भर दिया. कैफ़ी साहब की दो प्रसिद्ध कविताओं "औरत" और "दूसरा वनवास" का भावपूर्ण पाठ वरिष्ठ रंगकर्मी और अध्यक्ष एम. ए. रहीम ने किया. मोहम्मद शोएब के द्वारा कैफ़ी साहब की ज़िन्दगी और शायरी पर लिखे आलेख का पाठ जगदीश चंद्र दास ने किया. प्रोफेसर अली एम. सैयद ने कहा कि कैफ़ी साहब के लिखे नज़्म, ग़ज़लें और गीत गूढ़ अर्थ लिए होती हैं. एक पाठ से ही उन्हें समझा नहीं जा सकता. प्रकाश चंद्र जोशी ने भी कैफ़ी साहब की लिखी कविताओं का पाठ किया.

कैफ़ी आज़मी साहब से प्रत्यक्ष मुलाक़ात पर अपने संस्मरण मदन आचार्य ने रखे. कैफ़ी आज़मी साहब की पुत्री प्रख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी से भेंट और कैफ़ी साहब से जुड़े आत्मीय संस्मरण का उल्लेख प्रसिद्ध गायक और हाईवे चैनल के संपादक देवशरण तिवारी ने किया. वैचारिक सत्र का संचालन जगदीश चंद्र दास ने किया. इसके बाद कैफ़ी आज़मी साहब के लिखे गीतों -ग़ज़लों की संगीतमय प्रस्तुति का सत्र संचालन प्रसिद्ध गायक और संपादक देवशरण तिवारी ने करते हुए अर्थ फ़िल्म के लिए कैफ़ी साहब की लिखी ग़ज़लों - कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यूँ है... और तुम इतना क्यूँ मुस्कुरा रहे हो... हिमांशु शेखर झा ने गीत - ये नयन डरे -डरे (फ़िल्म कोहरा ), मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था (फ़िल्म हक़ीक़त )और संगीता दास ने फ़िल्म अर्थ के लिए कैफ़ी साहब की लिखी ग़ज़ल " झुकी -झुकी सी नज़र बेक़रार क्यूँ है... की संगीतमय प्रस्तुति दी. सुषमा झा ने वक़्त ने किया, क्या हंसी सितम... गीत पेश किया. वेदांत झा ने - तुम जो मिल गए हो... की प्रस्तुति दी. संगीत सत्र को श्रोताओं ने बहुत पसंद किया. एम. ए. रहीम के अध्यक्षीय सम्बोधन के बाद आभार प्रदर्शन सचिव योगेंद्र राठौर ने किया. कार्यक्रम में विक्रम सोनी, जोगेंद्र महापात्र, आशीष रंगनाथ, मोहम्मद एजाज, योगेंद्र मोतीवाला, श्रीनिवास रथ, अजय श्रीवास्तब, लच्छिन्दर बघेल, शैलेन्द्र दुबे, पी जी राव,बंशीलाल विश्वकर्मा, अनिता राज, गायत्री आचार्य, मोहिनी ठाकुर, सुनीला झा, शिवेंदु झा, अवध किशोर शर्मा, शमीम बहार, उर्मिला आचार्य, ममता तिवारी, दिनेश दिवाकर, विजय आचार्य, सी पी यादव, उमेश आचार्य, भरत गंगादित्य, नरेश मिश्र भी उपस्थित थे.


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