कृत्रिम तरीके से तापमान काबू करना इंसान के लिए सही होगा ?

Category: वर्ल्ड Written by वेदांत झा Hits: 698

जलवायु परिवर्तन पर विशेष -The अख़बार:

जलवायु परिवर्तन बढ़ती आबादी और सिमटती रिहाइशी जगहों की वजह से सिंगापुर जमीन के नीचे की जगह का इस्तेमाल करने के लिए तैयारी कर रहा है. सिंगापुर की 2019 में अंडरग्राउंड मास्टर प्लान को लांच करने की योजना है.

जलवायु परिवर्तन

सिंगापुर में करीब 56 लाख लोग रहते हैं, जिनकी संख्या 2030 तक 69 लाख हो जाएगी. बढ़ती आबादी के लिए इस द्वीप पर जमीन की कमी होती जा रही है. ऐसे में सिंगापुर में कई दशकों से नई जमीन को “रीक्लेम” किया जा रहा है. रीक्लेम से आशय उस प्रक्रिया से है, जिसमें पहले किसी और काम में आने वाली या बेकार पड़ी जमीन को रहनें के लिए इस्तेमाल किया जाए. मगर अब ऐसा करना मुमकिन नहीं होगा क्योंकि समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन की वजह से और भी मुश्किलें बढ़ चुकी हैं. इसलिये कुछ बुनियादी ढांचे जैसे रेल लाइनों, पैदल चलने के लिए रास्ते, पांच-लेन वाले राजमार्ग और एयर-कंडीशनिंग की पाइपों को जमीन के नीचे कर दिया गया है. यहां ईंधन और गोला-बारूद को भी रखा जाता है. अंडरग्राउंड मास्टर प्लान में डाटा सेंटर, यूटिलिटी प्लांट, बस डिपो सहित गहरी-सुरंग वाली सीवेज प्रणाली, भंडारण और पानी के जलाशय भी होंगे. अभी घरों और दफ्तरों को जमीन के नीचे ले जाने की योजना नहीं हैं. सिंगापुर का भूमिगत रेल घनत्व अभी जापानी राजधानी टोक्यो से कम है, वहीं भूमिगत पैदल यात्री पथ के लिए घनत्व सिंगापुर में सबसे कम है. सिंगापुर का एक्सप्रेस-वे नेटवर्क लगभग 180 किलोमीटर का है और उसका 10 प्रतिशत जमीन के अंदर है. भूमिगत मास्टर प्लान में 3डी तकनीक का इस्तेमाल होगा, जिससे वो जगह भी ऐसी दिखेगी जैसी वो नहीं है. ये ‘वर्चुअल सिंगापुर’ योजना का हिस्सा है. इस 3डी तकनीक की मदद से बहुत से डाटा का विश्लेषण हो सकेगा, जिससे ना सिर्फ शहरी नियोजन में मदद मिलेगी बल्कि कोई आपदा भी संभाली जा सकती है.

धरती को ठंडा करने प्रकृति से छेड़छाड़

1991 में फिलीपींस के पिनाटुबो में हुए विस्फोट से सल्फर की चादर को पूरी दुनिया में फैल गई थी, जिसे घुलने में करीब एक साल लग गया था और तापमान उसके बाद ही बढ़ना शुरू हुआ. पिनाटुबो ने धरती को ठंडा किया, और उसकी वजह से वैश्विक तापमान आधा डिग्री तक कम हो गया था. दुनिया में कहीं भी होने वाला एक बड़ा ज्वालामुखी धमाका तापमान को आधा डिग्री तक गिरा देता है. ज्वालामुखी के फटते ही वायुमंडल में धुएं और राख का गुबार फैल जाता है. सल्फर यानि गंधक के कण काफी ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं और सूर्य की किरणों को रोकने लगते हैं. नतीजा, तापमान में गिरावट. क्लाइमेट इंजीनियरिंग के वैज्ञानिक कुदरत के इस खेल की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं. वे वायुमंडल में सल्फर पार्टिकल्स की मदद से वे ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ना चाहते हैं. इस तरह के दखल के कितने व्यापक परिणाम होंगे, यह समझना अभी सोच से परे हैं। उनका मानना है कि यह हम पर है कि हम तापमान कितना कम करना चाहते हैं. जर्मन शहर हैम्बर्ग के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर मिटीरियोलॉजी में वैज्ञानिक उलरिके निमायर, तकनीकी संभावनाओं की इशारा करते हुए कहती हैं, हमें लगता हैं कि तकनीकी रूप से सल्फर डाय ऑक्साइड को वायुमंडल में छोड़ना संभव है. रिफ्लेक्टरों की तरह काम करते हुए ये पार्टिकल सूरज की रोशनी को परावर्तित कर सकते हैं. एक वैश्विक रक्षा छतरी, जो शायद हमारी पृथ्वी को ठंडा कर सके. सैद्धांतिक रूप से यह सोचा जा सकता है कि सल्फर के जितने चाहे कणों को स्ट्रेसोफीयर में पहुंचाया जा सकता है, उलरिके निमायर कहती हैं, ‘जलवायु बहुत ही जटिल मामला है, इसे हम मॉडल कैलकुलेशन से नहीं समझ सकते, हम यह नहीं कह सकते हैं कि चैंकाने वाला साइड इफेक्ट नहीं होगा. हम ऐसे परिणामों का अंदाजा नहीं लगा सकते.’ दुनिया भर के वैज्ञानिक जलवायु को प्रभावित करने के तरीकों पर काम कर रहे हैं. क्लाइमेट इंजीनियरिंग का मतलब है, पृथ्वी के रासायनिक और भौतिक गुणों पर असर डालना.
जमीन पर भी क्लाइमेट इंजीनियरिंग के एक्सपेरिमेंट चल रहे हैं. स्विट्जरलैंड में हवा से सीओटू फिल्टर की जा रही है. इस सीओटू को या तो पौधों के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है या फिर जमीन के भीतर स्टोर किया जाता है. इस मॉडल को दुनिया भर में लागू किया जा सकता है. जमीन के भीतर सीओटू के स्टोरेज को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं हैं. आलोचकों का कहना है कि ताकतवर भूकंप आया तो गैस लीक हो जाएगी, ये भूजल में भी घुल सकती है. इसके दूरगामी नतीजों के बारे में ठोस रूप से अभी कोई कुछ नहीं कह सकता.
क्लाइमेट इंजीनियरिंग का सवाल राजनेताओं को भी परेशान कर रहा है. इसे, सचमुच और कैसे इस्तेमाल किया जाए, इस बारे में कोई नियम नहीं है. लेकिन खुद विशेषज्ञ भी संदेहों से भरे हुए हैं. जलवायु में इंसानी दखल के कई अन्य घातक परिणाम हो सकते हैं. कुछ ताकतें राजनीतिक मंशा से इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकती हैं.

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