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सुषमा स्वराज का निधन, आइये जानें उनके स्वर्णिम जीवन को बारीकी से


News Creation : अपनें अंतिम क्षणों में उन्होनें देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धारा 370 हटाये जानें की बढाई दी थी. सुषमा स्वराज वाही नेत्री जिन्होनें अपनें विदेश मंत्री के रूप में कार्यकाल में विदेश में फंसे भारतियों की बेबाकी से मदद करनें के साथ साथ सकुशल भारत लानें में अपना योगदान दिया.

सुषमा स्वराज का जन्म  14  फरवरी 1952 में अम्बाला छावनी में हुआ.  सुषमा स्वराज ने एस॰डी॰ कालेज अम्बाला छावनी से बी॰ए॰ तथा पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली.


पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पहले जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद वे सक्रिय राजनीति से जुड़ गयीं. वे एक भारतीय महिला राजनीतिज्ञ और भारत की विदेश मंत्री रह चुकीं हैं.  वे वर्ष 2009 में भारत की भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गयी थीं, इस नाते वे भारत की पन्द्रहवीं लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता रही हैं. इसके पहले भी वे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में रह चुकी हैं तथा दिल्ली की मुख्यमन्त्री भी रही हैं. वे सन 2009 के लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के 19 सदस्यीय चुनाव-प्रचार-समिति की अध्यक्ष भी रहीं थीं.

 

आइये विस्तार से जानें सुषमा स्वराज के बारे में-

  • वर्ष 2014 में उन्हें भारत की पहली महिला विदेश मंत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है,  जबकि इसके पहले इंदिरा गांधी दो बार कार्यवाहक विदेश मंत्री रह चुकी हैं. कैबिनेट में उन्हे शामिल करके उनके कद और काबिलियत को स्वीकारा.  वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और देश में किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता बनने की उपलब्धि भी उन्हीं के नाम दर्ज है.
  • सुषमा स्वराज अप्रैल 1990 में सांसद बनीं और 1990-96 के दौरान राज्यसभा में रहीं. 1996 में वो 11वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं और अटल बिहारी वाजपेयी की तेरह दिनों की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनीं. 12वीं लोकसभा के लिए वो फिर दक्षिण दिल्ली से चुनी गईं और पुन उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया.
  • अक्टूबर 1998 में उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. बाद में जब विधानसभा चुनावों में पार्टी हार गई तो वे राष्ट्रीय राजनीति में लौट आईं.
  • 1999 के लोकसभा चुनाव में सुषमा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी संसदीय क्षेत्र, कर्नाटक से चुनाव लड़ा, लेकिन वो हार गईं. 2000 में वो फिर से राज्यसभा में पहुंचीं थीं और उन्हें दोबारा सूचना-प्रसारण मंत्री बना दिया गया. सुषमा मई 2004 तक सरकार में रहीं.

सांसद के रूप में मिली ये उपलब्धि

  • संसद के केन्द्रीय कक्ष में सम्पन्न एक गरिमामय कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और राज्य सभा सांसद सुषमा स्वराज को वर्ष 2004 के लिए 'उत्कृष्ट सांसद सम्मान' से अलंकृत किया था. प्रतिभा पाटिल ने सुषमा स्वराज की प्रशंसा करते हुए उन्हें राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों की प्रखर वक्ता बताया था. इस मौके पर सुषमा ने इस पुरस्कार के लिए पहली बार किसी महिला को चुनने के लिए चयन समिति को धन्यवाद दिया और कहा कि "यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें यह पुरस्कार देश की पहली महिला राष्ट्रपति के हाथों मिला है." उन्होंने आगे कहा कि "मेरा क़द तो छोटा था. सहयोगियों ने यह पुरस्कार देकर मेरे क़द को और भी बड़ा कर दिया है." इसके साथ ही सुषमा ने ईश्वर से इस पुरस्कार की मर्यादा को बनाए रखने की शक्ति प्रदान करने की कामना की और वचन दिया कि वह हर संभव प्रयास कर इस पुरस्कार का मान सम्मान बनाए रखने का प्रयास करेंगी.
  • इसके अतिरिक्त सुषमा स्वराज को प्रशस्ति पत्र भी प्राप्त हुआ है. इनको अर्पित प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि- "श्रीमती सुषमा स्वराज का तीन दशकों से अधिक का उत्कृष्ट सार्वजनिक जीवन रहा है. उन्हें हरियाणा सरकार में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री तथा दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है. एक प्रतिभाशाली वक्ता होने के साथ-साथ उन्होंने देश में संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में विशिष्ट योगदान दिया है."

ये भी जानें -

  • एक समय उनका नाम भाजपा के अध्यक्ष के लिए भी चला था. लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी राजनाथ सिंह को मिली.
  • मूल रूप से गैर भाजपा राजनीति से भाजपा में आईं सुषमा स्वराज को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नेताओं का भी भरोसा और विश्वास प्राप्त था. पूर्व सर संघचालक के.एस. सुदर्शन भी सुषमा को बेहद योग्य नेता मानते थे.
  • दक्षिण दिल्ली संसदीय सीट से दूसरी बार 12वीं लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद वह दूसरी वाजपेयी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं और उन्हें दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया.
  • अपने कार्यकाल के दौरान सुषमा ने ही फिल्म निर्माण को उद्योग का दर्जा दिया, जिससे फिल्म उद्योग बैंक से वित्तपोषण के योग्य हो सका. पार्टी नेतृत्व के कहने पर वह अक्तूबर 1998 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल छोड़ कर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. वह जनवरी 2003 से मई 2004 तक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों की मंत्री रहीं.

तब किया था सन्यास का ऐलान -

  • 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान  सुषमा स्वराज ने स्वंय अगला लोकसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा के साथ ही राजनीति से संन्यास का इरादा जाहिर कर दिया था. सुषमा स्वराज का अचानक चले जाना भाजपा ही नहीं भारतीय राजनीति की एक बड़ी क्षति है. देश और दिल्ली वाले अपनी इस मुखर और प्रखर नेता को हमेशा याद रखेंगे.

सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल -

1975 में सुषमा की शादी "स्वराज कौशल" से हुई. कौशल भी 6 साल तक राज्यसभा में सांसद रहे इसके अलावा वो मिजोरम के राज्यपाल भी रह चुके हैं. स्वराज कौशल अभी तक सबसे कम आयु में राज्यपाल का पद प्राप्त करने वाले व्यक्ति हैं. सुषमा स्वराज और उनके पति की उपलब्धियों के ये रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करते हुए उन्हें विशेष दंपति का स्थान दिया गया है. उनकी एक बेटी है जो वकील है. आइये उनके जीवन की उपलब्धियों को क्रमवार समझे.

  • भारत की राजनीति में स्वराज कौशल को एक बेहतर राजनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है। कौशल हरियाणा से छ: साल तक राज्यसभा में सांसद रहे. वे मिजोरम में राज्यपाल भी रह चुके हैं. वे सबसे कम आयु में राज्यपाल बनने वाले व्यक्ति हैं. 13 जुलाई, सन 1975 को उनका विवाह सुषमा स्वराज के साथ संपन्न हुआ था. स्वराज कौशल और सुषमा स्वराज की उपलब्धियों का स्वर्णिम रिकॉर्ड 'लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज हो चुका है.
  • स्वराज कौशल सुप्रीम कोर्ट के नामचीन क्रिमिनल मामलों के वकील हैं. वे राजधानी के पेज थ्री सर्किल से हमेशा दूर रहते हैं. वह देश की प्रमुख पार्टी 'भाजपा' (भारतीय जनता पार्टी) की शीर्ष महिला नेत्री सुषमा स्वराज के पति हैं. हालांकि, उनकी पत्नी भाजपा की बड़ी नेता हैं, पर वे भाजपा से कोई लेना-देना नहीं रखते. कौशल महज 37 साल की उम्र में मिजोरम के गवर्नर बन गए थे.
  • इतनी छोटी उम्र में कभी कोई किसी प्रदेश का गवर्नर नहीं बना. उनकी इस उपलब्धि ने उन्हें और भी खास बनाया है.
  • उन्होंने ही पृथकतावादी मिजोरम और केन्द्र के बीच समझौता करवाने में अहम भूमिका निभाई थी वे समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हैं. स्वराज कौशल साल 2000 में राज्यसभा के सदस्य भी थे.
  • कौशल काफी अध्यनशील व्यक्ति भी हैं. इमरजेंसी के दिनों में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के पक्ष में बड़ौदा डायनामाइट केस में मुकदमा लड़ा था.
  • वे देश के एडवोकेट जनरल भी रहे.  वे संगीत में भी दिलचस्पी लेते हैं.

आर्टिकल 370 के हटनें के बाद बस्तर के एक बुद्धिजीवी की प्रतिक्रिया !


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